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‘जीयो और जीने दो...!’
January 6, 2020 • JAWABDEHI • संपादकीय

जगजीतसिंह भाटिया
प्रधान संपादक


आखिर गुंडे कौन है? इनके स्वरूप और आचार-विचार क्या है, ये जानना बड़ी टेढ़ी खीर है। ये गुंडे समाज में ही रहते हैं और समाज में नाम-सम्मान प्राप्त होते हुए भी विपरीत दिशा में काम करते हैं, जो किसी को नहीं भाते, लेकिन उनका मान-सम्मान बरकरार रहता है, जब तक कि उनके ऊपर बैठे उनके आका तक भेंट-चढ़ावा पहुंचता रहता है, तब तक!
असल में गुंडों की परिभाषा अलग-अलग है। कुछ गुंडे सरेआम हथियार लेकर लोगों को धमकाते हैं और वसूली करते हैं..., और कुछ गुंडे आप और हमारे बीच रहकर ‘सभ्यता’ से वसूली करते रहते हैं, उन्हें न तो कोई रुपए देने से मना करता है और न ही किसी प्रकार का मोल-भाव करता है।  ऐसे ही कहानी है इन गुंडों की।

एक उदाहरण देखो प्रधान आरक्षक की ‘दरियादिली’ का। मामला मध्यप्रदेश के सिवनी का है। एक वीडियो वायरल हुआ, जो आबकारी विभाग के घंसौर कार्यालय में पदस्थ आरक्षक अमृतलाल झारिया का है।  दरअसल, यहां के आदिवासी इलाके कई परिवार कच्ची शराब का अवैध कारोबार करते हैं। इनमें महिलाओं की भी बराबर की हिस्सेदारी रहती है, जिन्हें प्रधान आरक्षक ने पकड़ लिया और आबकारी विभाग कार्यालय ले आया।  ये बात जैसे ही महिलाओं के परिजनों को पता चली तो वे आबकारी विभाग पहुंच गए। यहां प्रधान आरक्षक ने परिजनों को धमकाते हुए रुपयों की मांग की और नहीं देने पर महिलाओं को जेल भेज देने की चेतावनी दी। इसके बाद परिजन रुपयों का इंतजाम करने का कहकर चले गए। थोड़ी देर बाद परिजन रुपए लेकर आए और प्रधान आरक्षक और एक अन्य आरक्षक को रुपए देकर महिलाओं को छुड़ाकर ले गए। वीडियो में प्रधान आरक्षक महिलाओं के परिजनों से फिर से आराम से शराब बेचने की बात कह रहे हैं।  इसे कहते है दरियादिली। माल दो और अवैध काम करते रहो।

वैसे ये समाज के गुंडे लोगों को ‘जीयो और जीने दो’ का ही संदेश दे रहे हैं, लेकिन इनका संदेश देने का तरीका अपना है। वैसे आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इसी तरह के और  भी बड़े गुंडे हैं, जो बड़े ओहदों पर बैठकर असल जिंदगी का मजा लूट रहे हैं। इनकी अपनी गैंग है, जो सामाजिक दायरे में रहकर ‘भेंट’ मांगती फिरती है, और पीड़ित दर्द से कराहता हुआ भी हंसी-हंसी इनको चढ़ावा देता आ रहा है। इन्हें भक्त की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं रहता। वर्तमान में मध्यप्रदेश में कानून राज चल रहा है, भूमाफियाओं के अवैध कब्जे जमींदोज किए जा रहे हैं। दोनों ही प्रमुख पार्टियों से जुड़े हुए भूमाफिया निकल रहे हैं। मजेदार बात ये है कि शहद की मिठास का लुत्फ जो उठा रहे थे, वो अभी इस फिल्म में सस्पेंस की तरह है और शायद हो सकता है रहेंगे भी। नेताओं की त्योंरियां चढ़ी हुई है, लेकिन कोई कर भी क्या सकता है, क्योंकि गब्बर तो लवाजमे के साथ मैदान में है और इस मैदान में न तो संजीव कुमार अपने कटे हाथों के साथ दिखाई दे रहा है और न ही जय-वीरू।