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आ..., अब लौट चले
April 29, 2020 • JAWABDEHI • इंदौर

 

जगजीतसिंह भाटिया
प्रधान संपादक, जवाबदेही

इंदौर।  कोरोना वायरस जिंदगी के लिए कितना घातक है ये दुनिया ने देख लिया। वहीं, हमारे देश की बात की जाए तो परिवार एकजुट हो गए और लोग घरों में एकसाथ समय बिताने लगे। ऐसा करते-करते करीब एक से डेढ़ माह हो गया है। कुछ मीठी यादें और कुछ कड़ुवाहट छोड़कर जाएगा ये कोरोना। लेकिन कोरोना से जंग के जद्दोहद के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात देखने को मिली कि जिन परिवारों के युवा, जो विदेशों में कमाने गए हैं, उनके परिवारों के  चाहे वो जवान हो या बुजुर्ग, सभी के चेहरे की खुशियां गायब दिखी, ऐसा नहीं कि उनके पास रुपए-पैसे नहीं है, लेकिन जो दंपत्ती 50 से 55 के बीच हैं, उनके चेहरे पर लोगों को दिखाने के लिए उत्साह तो था, लेकिन मन दुखी था। वहीं वृद्धा अवस्था में पहुंच चुके लोगों का दर्द उनकी बेबसी देखकर ही पता चलता है कि उन्होंने पैसों की खातिर क्या खोया और क्या पाया। आज कोरोना से लड़ने की जंग जो हमारे देश में चल रही है, उसमें सबसे बड़ी ताकत मददगारों की है। इंदौर में जैसा कि कहा जाता है कि मां अहिल्या की नगरी में कोई भूखा नहीं सोता तो ये बात भी कोरोना काल में पुख्ता हो गई, जिसे कोई झूठला नहीं सकता। वहीं, उन लोगों का दुख सबसे बड़ा है, जिनके बच्चे विदेशों में रह रहे हैं और उनके माता-पिता को दिन-रात उनकी चिंता लगी है। वहीं सबसे बड़ा दर्द उन बूढ़े हो चुके मां और पिता का है, जो आज अकेले और बेबस हैं। कोई उनकी पूछपरख करने वाला नहीं है। बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाकर धन-दौलत कमाने के लिए विदेश भेज दिया और बच्चे विदेशों की चकाचौंध में जाकर खो गए हैं। ये दर्द सिर्फ इंदौर में रह रहे परिवारों का ही नहीं है, पूरे भारतीयों का है। हर मां-बाप की इच्छा रहती है कि उनकी संतान पढ़-लिखकर एक अच्छा इनसान बने और नौकरी-धंधे से लग जाए और बच्चे पढ़-लिखकर विदेशों का रूख करते हैं। कुछ दिन तक तो मां-बाप को समाजजन और रिश्तेदारों और दोस्तों के बीच ये कहने में बड़ा गुमान होता है कि मेरा बेटा, अमेरिका में है, कनाडा में है, मलेशिया और दुबई में है और बस अगले महीने आ रहा है दो दिन या पंद्रह दिन के लिए....बस इन्हीं बातों के सहारे न जाने उनकी आंखें कब बूढ़ी हो जाती है और वो उस दिन को कोसते हैं कि उन्होंने क्यों बच्चों को विदेश की राह दिखाई..। 

कुछ दुख भरे उदाहरण भी हमें इस कोरोना संकट के बीच देखने को मिले। इंदौर का ही उदाहरण लेते हैं कि कोरोना की चपेट में आए डॉक्टर पंजवानी की मौत हुई, लेकिन उनका अंतिम संस्कार उनके बेटे नहीं कर सके, क्योंकि वो विदेश में हैं। मोबाइल पर पिता के अंतिम दर्शन किए और दशाकर्म भी। इसी तरह कई लोग ऐसे भी है, जिनकी अस्थियों को विसर्जित करने के लिए उनके बेटों के पास समय ही नहीं है और वो विदेशों में बसे हैं और अस्थियां श्मशान के किसी रूम में ‘लॉकडाउन’ है। 
कोरोना के इस संकट के दौर ने लोगों को ये बात तो सीखा दी कि अपनों को पास में रखना चाहिए, क्योंकि जिन परिवारों के बच्चे विदेशों में है तो वो पूरी तरह मदद के भरोसे है और उनकी मदद पड़ोसी कर रहे हैं या फिर सामाजिक संस्था, क्योंकि लॉकडाउन के समय रिश्तेदार भी अपने-अपने घरों में कैद है और सिर्फ हाल-चाल पूछने के अलावा वो कुछ कर भी नहीं सकते। ऐसे में मीडिया से जुड़े कुछ लोग और स्वास्थ्य सेवा और कोरोना से लड़ने वाले योद्धा ही उनके लिए मददगार साबित हुए। 
जवाबदेही किसी परिवार के मन को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता, लेकिन कोरोना काल के दौरान जो हकीकत दिखाई दी, तो लिखे बिना भी नहीं रहा गया। आज लोगों को समझना होगा कि हमारे देश में रहकर उनके अपने खुद को साबित कर सकते हैं..., और संकट आने पर माता-पिता के साथ रह सकते है...। और जो युवा विदेश बस गए हैं तो वो कोशिश कर सकते हैं अपने वतन लौटने की..., क्योंकि अभी भी वक्त है उनके अपने..., उनका इंतजार कर रहे हैं।