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आज..., फिर याद आ गए दशरथ मांझी
September 14, 2020 • JAWABDEHI • संपादकीय

जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र


कभी-कभी कुछ तस्वीरें और खबरें इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है कि वो जिंदगीभर के लिए अमिट छाप छोड़ जाती है। ...वहीं, इन खबरों से फिल्म बनाने वाले करोड़ों रुपये कमाकर अपनी तिजोरी भर लेते हैं, और जिस व्यक्ति को सामने रखकर पूरी कहानी गढ़ी जाती है। मेहनत करने वाले के हिस्से में आती है  उसकी वह तस्वीर, जिसे या तो फिल्म शुरू होने के पहले दिखाई जाएगी या फिल्म खत्म होने के बाद।

किस्सा है बिहार में गया से 80 किमी दूर कोठिलवा गांव का। यहां के ग्रामीण लौंगी भुइयां, जिनकी उम्र 70 वर्ष है। उन्होंने 30 साल तक हाड़-तोड़ मेहनत कर पहाड़ी रास्ते को समतल कर दिया और तीन किमी लंबी नहर बना दी, ताकि खेतों को भरपूर पानी मिले। वहीं, गांव के तीन हजार लोगों को फायदा मिल रहा है। इस बुजुर्ग का कहना है कि बारिश में पहाड़ों से गिरने वाला पानी नदी में बह जाता था। मुझे लगता है कि यह पानी खेतों में आ जाए तो गांववालों को मदद मिलेगी।

प्रेरणादायी कार्य किया है इस व्यक्ति ने, लेकिन सवाल हमारी प्रशानिक व्यवस्था पर उठता है कि जब इस व्यक्ति ने काम शुरू किया तो इनकी उम्र करीब 40 वर्ष होगी। इतने सालों में किसी भी नेता, सरकार या ग्रामीण क्षेत्र के जिम्मेदारों का ध्यान नहीं गया, कि इस गांव की सुध लेते और जिस काम को इस व्यक्ति को करने में 30 साल लगे, उसे मशीनों से जल्द निपटा देते।

आज भी बारिश के मौैसम में देशभर से खबरें आती रहती है कि फलां गांव के लोग अर्थी को बीच नदी से लेकर निकले, क्योंकि वहां बरसों से सड़क-पुलिया नहीं है। मध्यप्रदेश में कई जगह ऐसे हालात देखने में आए। क्या राज्य सरकारें सोती रहती है।
इसी तरह बिहार में गया के करीब गहलौर गांव के एक गरीब मजदूर दशरथ मांझी, जिन्हें ‘‘माउंटेन मैन’’ के नाम से जाना जाता है, जिनके नाम पर डाक टिकट भी जारी हुआ है। इन्होंने अकेले एक छेनी और हथौड़ा लेकर 360 फुट लंबे, 30 फीट चौड़ी और 25 फीट ऊंचे पहाड़ को काटकर सड़क बना दी थी। दशरथ मांझी ने यह काम 22 साल में पूरा किया था। (1960-1982)। यानी देश आजाद हो चुका था। कुल-मिलाकर सार ये है कि हमारे देश में कई ग्रामीण क्षेत्रों में हालात बिगड़े हुए हैं, लेकिन लाल फीताशाही सिर्फ सुख भोगती है..., और ऐसे विरले इंसान किसी भी मुसीबत को समाज की कमजोरी नहीं समझते और हर परेशानी उठाकर समाज के लिए राह आसान कर देते हैं, लेकिन सुधरता नहीं है तो सरकारी ढर्रा...। इन महापुरुषों के काल-कवलित होने के बाद, सरकार जागती है..., इनके नाम से ट्रस्ट बनते हैं, योजनाएं बनाई जाती है..., और फिर भ्रष्टाचार करके पैसा बनाया जाता है।