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आपदाकाल में : निजी डॉक्टरों की भूमिका पर सवालिया निशान
May 8, 2020 • ललित भारद्वाज  • इंदौर

 



डॉक्टर, पुलिस, सेना व सफाईकर्मी आदि देश के वे लोग होते हैं जिनकी परख देश पर आई महामारी व महाआपदा के समय होती है। अगर ये लोग ही आपदाकाल में पीठ दिखा जाएं तो देश के लिए इससे बड़ा कोई दुर्भाग्य नहीं होता। वर्तमान में पूरा विश्व कोरोना वायरस की महामारी की चपेट में आया हुआ है। ऐसे में उपरोक्त लोग अपने अपने राष्ट्रों की सेवा में निष्ठाभाव से लगे हुए हैं, लेकिन ऐसी महामारी के समयकाल में भारतवर्ष में निजी डॉक्टरों की भूमिका पर सवालिया निशान लगा हुआ है। हजारों रुपए फीस के रूप में वसूलने वाले व बेवजह जांच करवा कर मोटी कमीशन खाने वाले निजी डॉक्टर इस महामारी के काल में अपने-अपने घरों में दुबक कर बैठे हुए हैं। जिन लोगों के निजी क्लीनिक व अस्पताल हैं। जो महीने-महीने भर की अग्रिम सूचना पर उपलब्ध होते हैं। जिनके क्लिनिकों पर रोजाना लंबी-लंबी लाइनें लगी रहती हैं। जो अनाप-शनाप धन कमाकर करोड़पति बने बैठे हैं। जिनके पास उम्र का श्रेष्ठ अनुभव है। ऐसे निजी डॉक्टरों का रवैया इस महामारी काल में कतई ठीक नहीं है। जबकि इस वक्त सभी निजी अनुभवी डॉक्टरों का दायित्व बनता था कि वे सभी अपने-अपने घरों से निकलकर सरकारी डॉक्टरों के साथ मिलकर राष्ट्रभाव को समक्ष रखकर देश के पीड़ितों की खुले दिल से समर्पण भाव रखते हुए  अच्छी सेवा करते। इस धरती पर डॉक्टरों को ईश्वर रूप में देखा जाता है क्योंकि वह न केवल मानव जाति को ही बीमारियों से निजात दिलाते हैं अपितु मनुष्यों के साथ-साथ प्राणी मात्र को भी नया जीवन प्रदान करते हैं, लेकिन आज भारतवर्ष में अधिकांशत: निजी डॉक्टर ऐसे हैं जो अपने-अपने चिकित्सीय अनुभव का लाभ इस महामारी के दौर में देश को दे नहीं रहे हैं। इसका मुख्य कारण सिर्फ यही है कि या तो उनको इस महामारी का भय सता रहा है और या इस समय उनको उनकी सेवा के बदले में कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। इसलिए निजी डॉक्टर इस महामारी काल में भी देश सेवा से पीछे हट रहे हैं। आज भारतवर्ष में एक से बढ़कर एक गुणी व अनुभवी निजी डॉक्टर्स विद्यमान है। यह तो हिंदुस्तान की किस्मत इतनी अच्छी है कि इतने बड़े लॉकडाउन में लोग नियमित बीमारियों से लगभग बचे हुए बैठे हैं। क्योंकि उसका मुख्य कारण यह भी है कि इस लॉकडाउन में किसी को भी बाजार का सड़े हुए गंदे तेल का तला-भुना, फास्ट फूड व जंक फूड आदि उपलब्ध नहीं हो रहा मात्र घर के सात्विक भोजन के अलावा। इस कारण भी लोगों को बीमारियों से निजात मिली हुई है। लेकिन चाहे कुछ भी है लेखक निजी डॉक्टरों की भूमिका पर सवालिया निशान इसलिए खड़ा कर रहा है कि निजी डॉक्टरों के लिए राष्ट्र सेवा करने का इससे बड़ा अवसर फिर कभी मिलने वाला नहीं। ईश्वर करें ऐसा अवसर फिर कभी मिले भी ना। इसलिए यही वह समय है कि सभी निजी डॉक्टर्स अपने-अपने निजी अनुभवों के साथ सरकारी डॉक्टरों के साथ मिलकर राष्ट्रहित के यज्ञ के लिए अपनी-अपनी आहुति प्रदान करें। खैर वक्त तो गुजर जाएगा। राष्ट्र भी महामारी से निजात पा जाएगा। लेकिन शेष रह जाएगा निजी डॉक्टरों का नकारात्मक रवैया। ऐसे में क्या केंद्रीय सरकार निजी डॉक्टरों के नकारात्मक रवैए को लेकर भविष्य में कोई ठोस विधान पारित करेगी। वैसे लेखक का ऐसा मानना है कि केंद्र में बैठी सरकार भविष्य को समक्ष रखते हुए ऐसा कानून अवश्य बनाए जिसमें निजी डॉक्टरों को विपदा काल में राष्ट्र हेतु अपने अनुभवों का प्रतिपादन करना ही होगा।