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असली टाइगर तो  जनता ही है... 
July 6, 2020 • JAWABDEHI • संपादकीय

जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र

जब दुनिया के सामने कोरोना काल बनकर सामने खड़ा है, ऐसे में मध्यप्रदेश की राजनीति में सांप-नेवले की लड़ाई शुरू हो गई है। भाजपा और कांग्रेस के कागजी टाइगर दहाड़ तो नहीं रहे, बल्कि मिमियां रहे हैं। जनता का गम भूलकर ये नेता छिछोरी बातें ट्वीट कर रहे हैं। मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं, जैसे किसी गली-मोहल्ले में बच्चे लड़ते समय बोलते हैं और दोनों ओर से झुंड में खड़े इनके दोस्त भी एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाली बातें बोलते हैं। मजा किसी को नहीं आ रहा, खासकर जनता को..., लेकिन नेताओं कि ये चुटकियां शायद इन्हीं को खुशी देती हो।

खास बात ये है कि वर्तमान में नेताओं के पास कुछ करने के लिए है नहीं, तो निकम्मा बनिया करें क्या? दूसरी ओर ये वरिष्ठ नेता एक-दूसरे को शिकारी बता रहे हैं। असल  शिकार करने वाला टाइगर (जनता) इस समय खामोश है, क्योंकि उसके शिकार करने का वक्त अभी आया नहीं है, जनता रियल टाइगर है, क्योंकि जिस तरह से जंगल में टाइगर अपने शिकार को टारगेट करता है और दबे पांव धीरे-धीरे उसके पास पहुंचता है और फिर पूरी ताकत झोंक देता है शिकार करने में। ठीक उसी तरह हमारे देश की जनता भी है..., मौके का इंतजार करती है। इसलिए नेताओं को ये भ्रम नहीं पालना चाहिए कि वो टाइगर है। 

अब बात जनता की करते हैं..., मध्यप्रदेश में भले ही सरकार अभी भाजपा की हो गई है, लेकिन जनता को इसका क्या लाभ मिला। कांग्रेस की सरकार थी तो जनता क्या लाभ मिला। करीब 15 साल का वनवास काटकर मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार सत्ता में काबिज हुई। सरकार ने जनता की तरफ ध्यान देने बजाए तबादला नीति पर जोर दिया गया, जो अफसर शिवराज सरकार के समय से जमे थे, उन्हें इधर से उधर किया गया। पूरे प्रदेश में तबादला कारोबार खोल दिया गयाा। मनचाही जगह सरकारी नौकरों को भेजने के बदले नेताओं पर माल बटोरने के आरोप लगते रहे। दूसरी ओर अपराध न तो भाजपा के शासनकाल में कम हुए और न ही कांग्रेस के। 

अब पक्ष और विपक्ष को मिलकर छिछोरी हरकत छोड़कर जनता के कामों की तरफ ध्यान देना चाहिए। बड़ी संख्या में लोगों के सामने रोजगार का संकट पैदा हो गया है। लॉकडाउन की वजह से हर व्यक्ति की हालत खराब हो चुकी है। अब केंद्र सरकार की ( पीएम स्वनिधि योजना) 1 जुलाई से शुरू हो चुकी है। इस योजना के तहत रेहड़ी और फुटपाथ पर व्यापार करने वाले करीब 50 लाख लोगों को रोजगार की दृष्टि से सरकार को लोन देना है। ये योजना कारगर साबित हो और ईमानदारी से पात्र लोगों को इसका लाभ मिले इस बात पर नेताओं को ध्यान देना चाहिए।

हम इंदौर शहर की बात करें तो लगभग हर घर में मजदूर डायरी बन गई है। जो व्यक्ति अच्छी-खासी नौकरी कर रहा है, उसकी पत्नी भले ही कहीं काम पर नहीं जा रही हो, लेकिन सिलाई-कढ़ाई और यहां तक कि घरेलू काम करने वाली महिला के नाम से मजदूर डायरी बना ली है और लगभग नगर निगम के हर झोनल कार्यालय से लोन के लिए फॉर्म भरे जा रहे हैं। कुछ दिन पहले लॉकडाउन के समय भी अपात्र लोगों के खाते हर माह 5,000/- हजार रुपये आए। लॉकडाउन के दौरान निगम के कुछ कथित कर्मचारियों ने अपात्र लोगों से रुपये लिए और उन्हें मजदूर डायरी बनाकर दी। अब नेताओं और अफसरों की जिम्मेदारी बनती है कि वो हर घर की जांच करें और अपात्र लोगों पर कार्रवाई कर उनकी मजदूर डायरी निरस्त करें, क्योंकि इन अपात्र लोगों की वजह से वास्तविक लोगों को योजना का लाभ नहीं मिल रहा है।