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भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार, गुरु के बताए उपदेशों को समझना जरूरी
November 17, 2019 • जगजीतसिंह भाटिया, प्रधान संपादक • संपादकीय

 

श्री गुरुनानकदेवजी का 550वां प्रकाशोत्सव देश और दुनिया में बड़े उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। करतारपुर जाने के लिए पाकिस्तान सरकार ने कॉरिडोर बनाकर दिया ताकि हिंदुस्तान के लोग  उनके स्थान के दर्शन कर सके। सुल्तानपुर लोधी जहां पर गुरुजी ने बहुत समय बिताया और मोदी खाने में नौकरी की एवं वेई नदी में तीन दिन लुप्त रहकर ईश्वर का मिलन प्राप्त कर दुनिया को सही धर्म समझाया लेकिन हममें से ज्यादातर उनके समझाए धर्म को समझ नहीं पा रहे हैं। प्रकाश उत्सव मनाते वक्त हमारा ज्यादा ध्यान लंगर व्यवस्था पर केंद्रित रहा। सुल्तानपुर लोधी में 550 व्यंजन लंगर में रखे गए और बाकी सभी जगह पर भी ज्यादा से ज्यादा खाने की वैरायटी रखी गई। इसे देखकर गुरुजी के समय का एक प्रसंग भाई लालो और मलिक भागो का याद आ गया, जिसमें गुरुजी ने भाई लालो की दाल-रोटी खाना मंजूर किया था ना कि मलिक भागो का 56 भोग। और आज हम लोग मलिक भागो का लंगर ही चला रहे हैं। गुरुजी ने उस वक्त भूखे और गरीबों को खाना खिलाकर धर्म के नाम पर हो रहे पाखंड को खत्म करने का एक तरीका बताया लेकिन साथ में यह भी बताया कि सिर्फ और सिर्फ नाम जपके, वाणी पढ़कर ही ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है उनकी लिखी वाणी जपजी साहब, जिसका पाठ हम रोज सुबह करते हैं उसमें यह लिखा है कि (भुखिआ भुख न उतरी जे बंना पुरीआ भार।।) अर्थात भूखों की भूख कभी खत्म नहीं हो सकती, भले ही उसके सामने कई तरह के पकवान रख दे। इसी वाणी में आगे लिखा है कि (तीरथ तप दया दत दान।। जे को पावै तिल का मान।।) अर्थात तीर्थ करना, दया करना, तप करना, दान करना इत्यादि से सिर्फ ईश्वर के घर जाने का मार्ग सरल होता है उसका तिल जिनता ही फल मिलता है, लेकिन मुक्ति सिर्फ और सिर्फ नाम जपके, वाणी पढ़कर ही मिलती है। उनके तीन उपदेश कीरत करो, नाम जपो, वंड छको अर्थात मेहनत करो, नाम जपो और मिल-बांटकर खाओ अगर सिर्फ लंगर ही खिलाना होता तो वह नाम जपने के लिए नहीं बोलते। यदि उस ईश्वर को या हमारे गुरुओं को सोने-चांदी से प्यार होता तो जब पांचवें गुरुजी ने अमृतसर में श्री हरिमंदिर साहब बनाया था तो उसी वक्त वह उस पर सोना चढ़वा सकते थे और चांदी के दरवाजे लगवा सकते थे। गुरु गोबिंदसिंहजी के तीरों पर तो सोना लगा रहता था ताकि उनके तीर से मुगल सेना के या किसी भी सैनिक की मौत हो तो उसके क्रियाकर्म का इंतजार वह कर सके। 

ये तो बाद में महाराजा रणजीतसिंह जी ने गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा दिखाते हुए उस पर सोना चढ़वाया, लेकिन एक गलत चलन की शुरुआत उन्होंने कर दी। आज हम गुरु घरों में सिर्फ सोना चढ़ाना, चांदी चढ़ाना, सफेद मार्बल के पत्थर लगाना इसी कामों में लग गए और गुरुजी की शिक्षा को भूल गए। उनका कहना था कि गरीब का मुंह गुरु की गोलक अर्थात ईश्वर को यदि भेंट देनी है तो गरीब की सेवा करो। कोई भी गुरु पर्व से पहले नगर कीर्तन निकाला जाता है जिसमें कि गुरु ग्रंथ साहब नगर भ्रमण पर निकलते हैं उसका स्वरूप भी पूरे देश में बिगड़ता जा रहा है उसमें गाड़ियों का प्रदर्शन, मोटरसाइकिलों पर सवार होकर बदतमीजी करना, तरह-तरह के खाने प्रसाद के रूप में रखकर हम गुरुजी की खुशियां प्राप्त नहीं कर रहे, अपितु पाप के भागीदार बन रहे हैं। गरीब बच्चों को पढ़ाई, वाकई जरूरतमंद को खाना, बीमार को दवाई दिलाकर सिर्फ और सिर्फ हर वक्त उस वक्त को याद कर उसका नाम जपकर ही हम गुरु के बताए सच्चे मार्ग पर चल सकते हैं। एक और गलत परंपरा समाज में चल रही है कि अखंड पाठ (जो कि 48 घंटे तक लगातार चलता है)। पाठ रखवाते और समाप्ति के समय हाजिरी भरकर हम ये समझ रहे है कि हमने बहुत पुण्य का काम किया, जबकि यह तो ऐसा हुआ कि हमने राशन खरीदा, भोजन बनवाया और बनाने वाले को ही खिला दिया, हमारा पेट कैसे भरा? जब तक वाणी सुनोगे नहीं, पढ़ोगे नहीं तब तक कोई लाभ नहीं होने वाला। 

यदि वक्त रहते हम लोग नहीं संभले तो हो सकता है कि आज से 10-20 साल बाद हमारी परंपराओं का स्वरूप और भी खराब हो, क्योंकि हमारा धर्म सबसे नया एवं निराला है लेकिन हम अपने हाथ ही उसका निरालापन खत्म करने में लगे हैं और बाकी तो सभी इसे मिटाने में लगे ही हैं।