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देश को आत्मनिर्भर बनाना है?
May 25, 2020 • जगजीत सिंह भाटिया • संपादकीय

जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र

शब्द की गहराइयों को नजरअंदाज कर सोश्यल मीडिया पर उड़ा रहे मजाक
कोरोना संक्रमण के दौरान हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता को संबोधित किया। उनकी कही गई बातों को समझने के लिए शब्द की गहराइयों में जाना पड़ेगा। अभी गत दिनों उन्हें कहा कि हमें भारत को आत्मनिर्भर बनाना है। सरकार के विपक्ष में बैठे लोगों को तो कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है। और सोश्यल मीडिया पर अपना कीमती समय व्यर्थ करने वाले लोग ‘आत्मनिर्भर’ शब्द का मजाक बना रहे हैं।  

गत अंक में जवाबदेही ने संपादकीय में इस बात को प्रमुखता से प्रकाशित किया था कि ‘‘हमारे देश को हुनर ही तारेगा, माउस के भरोसे दुनिया से प्रतिस्पर्धा जीतना नामुमकीन है’’ अगर शब्द की गहराइयों को जनता समझे तो भारत को आत्मनिर्भर बनाने वाली बात ही हाथों में हुनर होना है। आज जरा-जरा सी गलतियों को लोग आत्मनिर्भरता से जोड़कर सोश्यल मीडिया पर वायरल कर रहे हैं। जब देश में कोरोना ने दस्तक दी और स्वास्थ्य विभाग अलर्ट हुआ और इस दरमियान प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि जो जहां है, वहां रहे तो लोगों ने एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश तक क्यों दुड़की लगाई। बस एक ही सोच कि जैसे भी वो अपने गांव पहुंच जाना है। गांव जाकर क्या कर लिया। गांव जाकर 15 दिन तक लोगों को टेंट में या गांव के किसी भवन में रहना पड़ा। रास्तेभर परेशानियां उठाते रहे। कुछ लोग बीमारी से चल बसे तो कुछ लोग गर्मी, भूख-प्यास से अपनों को छोड़ चले गए। सारा ठिकरा सरकार पर। इस समय कोई अन्य सरकार भी होती तो इसी तरह का रोना रोया जाता। कोरोना काल के पहले कई बार सरकारी अफसरों को कहा गया कि गरीबों और मजदूरों का पलायन रोको और उन्हें उनके ही गांव या क्षेत्र में काम दो। इसके चलते अफसरों ने योजनाएं तो लागू की और काम रजिस्टर में होता गया और मजदूरी भी रजिस्टर में ही दी गई। न काम हुआ न लोगों को रोजगार मिला। आज ग्रामीण क्षेत्रों की हालत इस कदर खराब हो चुकी है कि वहां के हालात अगर ईमानदारी से सुधारे जाए तो ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों को काम की तलाश में शहरों की ओर भटकना नहीं पड़ेगा। 
अफसरों को सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार करना आता है। आज ग्रामीण क्षेत्रों में बनाई गई नहरें क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। ऐसा क्यों, जब नहरें बनाने पर करोड़ों रुपया खर्च होता है तो उसकी देख-रेख क्यों नहीं हो पाती। पूरे मध्यप्रदेश में जहां-जहां भी नहरें बनाई गई है, वो  क्षतिग्रस्त हो चुकी है। अब इन्हें सुधारने के लिए ईमानदारी से ग्रामीणों को काम देना होगा और काम भी गुणवत्तापूर्वक होना चाहिए।

एक विचार करें कि ये भ्रष्टाचार क्या आज पैदा हुआ है? याद करो कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने एक आमसभा में (भ्रष्टाचार का उदाहरण देते हुए ) इस बात को जोर देकर कहा था कि सरकार की तरफ से गरीबों की मदद के लिए 1 रुपया पहुंचाया जाता है, लेकिन गरीबों तक पहुंचते-पहुंचते यह 10 पैसे हो जाता है। तब से लेकर आज तक भ्रष्टाचार के मामले में कोई अंकुश नहीं लग सका। बल्कि भ्रष्टाचारी दिन-दुनी-रात चौगुनी करने में लगे रहे। भ्रष्टाचार पर रोक किसी सख्ती से नहीं होगा, बल्कि उन अफसरों को, जो भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं, उन्हें ये बात समझनी होगी, कि सच्चाई से काम करें, होने दे, करने दे। जब आब पूरी तरह से खुद ईमानदारी से काम करोगे तो हर कोई अपनी तरफ से मेहनत करेगा और यही से शुरुआत होगी एक आत्मनिर्भर भारत की। भ्रष्टाचार से सिर्फ धन कमाया जा सकता है, देश को सुधारा नहीं जा सकता। सरकारें आती रहेगी, जाती रहेगी, लेकिन जब तक लोग खुद आत्मनिर्भर नहीं बनेंगे, तब तक हालात सुधरने वाले नहीं है।

मेहनत करना, काम करना ही आत्मनिर्भर होने की बात है। जब करोड़ों हाथ किसी न किसी हुनर को थाम लेंगे तो यकीन मानिए भारत को कोई ताकत आत्मनिर्भर बनने से रोक नहीं सकती। हमारा आत्मनिर्भर होना विश्व के लिए चुनौती है, क्योंकि हम दीवाली पर चीन की लाइटिंग ही लगाना पसंद करते हैं। परफ्यूम विदेशी लगाना चाहते हैं, पाउडर भी विदेश का चाहिए, चड्डी-बनियान भी..., और न जाने कितनी ऐसी वस्तुएं हैं जो विदेश से आती है, वो सब हमें चाहिए। ऐसा नहीं है कि हमारे यहां ये वस्तुएं उपलब्ध नहीं है, लेकिन रहन-सहन का स्टेटस हमें देश की तरफ झुकने नहीं दे रहा।

जवाबदेही अपील
घर में रहे, सुरक्षित रहे, एक-दूसरे से दूरी बनाकर रहे, बाजारों में सामान खरीदने के लिए भीड़ न लगाएं, प्रशासन के नियमों का पालन करें