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हिंदुस्तानियों इतिहास का पन्ना बनकर मत रह जाना
May 8, 2020 • ललित भारद्वाज  • इंदौर

 

 

अब ‘मैं’ को छोड़ने व ‘हम’ को अपनाने का समय सिर पर आकर खड़ा हो गया है। अब समय आ गया है जब हम हिंदुस्तानियों को अपने आपको हिंदुस्तानी बोलने में शर्म नहीं आनी चाहिए। बहुत विशाल है इस हिंदुस्तान की सभ्यता व संस्कृति। लेखक अक्सर यह बात देखता व सुनता आ रहा है कि हिंदुस्तान में रहने वाले लोग हिंदुस्तानी होने के बावजूद अपने आप को हिंदुस्तानी कहने में शर्म महसूस करते हैं। पंजाब का हिंदुस्तानी अपने आपको पंजाबी कहता है। महाराष्ट्र का हिंदुस्तानी अपने आप को महाराष्ट्रीयन कहता है, राजस्थान का हिंदुस्तानी राजस्थानी, हरियाणा वाला हरियाणवी, हिमाचल वाला हिमाचली, कर्नाटक वाला कन्नड,Þ तमिलनाडु वाला तमिल व इसी तरह गुजरात वाला गुजराती तथा पश्चिम बंगाल वाला अपने आपको पहले बंगाली ही बोलता है। जबकि सच यह है कि यह सभी पहले हिंदुस्तानी ही हैं, लेकिन अफसोस इनको अपने आपको हिंदुस्तानी कहने में बहुत लाज आती है। देखो हिंदुस्तान के देशवासियों पहले आप हिंदुस्तानी हैं बाद में आप पंजाबी, गुजराती, हरियाणवी, राजस्थानी, बंगाली व कन्नड़  इत्यादि हैं। 

देश इस वक्त जिन विकट परिस्थितियों के दौर से गुजर रहा है ऐसे में आप सबका सबसे पहले हिंदुस्तानी होना आवश्यक हो गया है। क्या आप जानते हैं कि विश्व के अधिकांशत: विकसित देशों के नागरिक अपने आपको जापानी, अमेरिकन, इटालियन, स्पेनिश  व फ्रांसीसी कहते हैं। उनको अपने आपको अपने देश का नागरिक कहने में गर्व महसूस होता है। लेकिन लेखक आज तक हिंदुस्तान को लेकर इस बात को समझ ही नहीं सका कि हिंदुस्तानी अपने आपको हिंदुस्तानी कहने में सकुचाता क्यों है। जबकि विदेशों में रहने वाला हिंदुस्तानी अपने आप को हिंदुस्तानी कहने में गर्व महसूस करता है। हिंदुस्तानियों वक्त रहते हिंदुस्तानी बन जाओ। सब के सब एक सूत्र में बंध जाओ अन्यथा आने वाले समय में आप सबका वजूद स्वत: ही समाप्त हो जाएगा और तो और आप सब इतिहास का पन्ना बनकर रह जाओगे। आज देश में लगभग 45 प्रतिशत लोग हिंदी भाषा बोलते हैं लेकिन उसके बावजूद अपने आप को हिंदुस्तानी नहीं बोलते। दूसरी ओर सरकार की दोषपूर्ण नीतियों के परिणाम स्वरूप आज भी सबसे ज्यादा बोले जाने वाली हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ। 

देखो हिंदुस्तान के देशवासियों दुनियाभर में आपकी पहचान हिंदुस्तानी के रूप में हैं प्रादेशिक रूप में नहीं। वैसे जब हिंदुस्तानी विदेश जाते हैं तो वहां अपने आप को हिंदुस्तानी बोलते हैं लेकिन देश के अंदर अपने आप को हिंदुस्तानी कहने में इन सबका गला सूखता है। ऐसा क्यों। हिंदुस्तान के हिंदुस्तानियों वक्त रहते सब पृथ्वीराज चौहान बन जाओ क्योंकि जयचंदों की तो इस देश में भरमार लगी हुई है। एकजुट होकर रहोगे तो कोई भी आपको तोड़ नहीं सकेगा लेकिन अपनी-अपनी ढ़फली बजाते हुए अकेले-अकेले रहे तो कोई भी आकर आपको आसानी से तोड़-फोड़ जाएगा। लेखक आपको कुछ नहीं कहना चाहता लेकिन वह तो आपको सब कुछ समझाने का प्रयास कर रहा है कि समय रहते समझ जाओ अन्यथा एक न एक 
दिन कोई न कोई तुम्हें जड़ से बिखेर देगा।