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हुनर ही तारेगा भारत को, ‘माउस’ के भरोसे दुनिया से व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में जीतना नामुमकिन
May 18, 2020 • जगजीत सिंह भाटिया • संपादकीय

जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र

आज पूरे विश्व पर कोरोना का संकट मंडरा रहा है और ऐसे में भारत में स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन अफसोस हमारे यहां की युवा पीढ़ी कहो या सीनियर सीटीजन सभी की सोच माउस पर आकर टीक गई है। एक क्लिक ने हमें इतना आलसी बना दिया है कि हर कोई अपने बच्चों को कम्प्यूटर का गुलाम बनाना चाह रहा है। माना कि आज की जरूरत कम्प्यूटर है, स्मार्ट वर्क करने के लिए, मगर कितने ऐसे काम है जो कम्प्यूटर बगैर होते रहे हैं और होते रहेंगे। 
दुर्भाग्य इस बात का है कि भारत का हर आदमी अपने बेटे को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, अफसर बनाना चाहता है। लेकिन उसे कभी दूसरे कामों की ओर प्रोत्साहित नहीं करता, जिसमें कि कोई हुनर हो। आज की पढ़ी-लिखी पीढ़ी पूरी तरह असाक्षर लोगों के भरोसे हो गई है। जितना पढ़ा-लिखा व्यक्ति नहीं कमा पाता, उससे ज्यादा हुनरबाज कमा रहे हैं। अभी जो वर्तमान में हालात पैदा हुए हैं, कि भारत में चीनी कंपनियां आना चाहती है तो भारत में तरह-तरह के सवाल होने लग गए हैं। कोई सोश्यल मीडिया पर अनर्गल टीप्पणी कर रहा है तो कोई मीडिया में अपने नाम के लेख छपवा रहा है। हमारे देश में लोगों को राय देने की बहुत बड़ी बीमारी है। हकीकत कभी नहीं स्वीकारते। कुछ रायचंद अखबारों में बड़े-बड़े लेख छपवाकर देश की अर्थव्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं या फिर टीवी पर अपनी राय दे रहे हैं और इनके बेटे-बेटियां, दामाद सारे विदेशों में सेटल हो चुके हैं और ऐश की जिंदगी गुजार रहे हैं और ये लोग भारत के मजदूरों का चिंतन कर रहे हैं। असल में हमारा देश कृषि प्रधान देश रहा है। हमारे यहां रोजगार के अवसर ज्यादा पैदा किए जा सकते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के दीमक ने इन रोजगार के अवसरों को देश में कभी फलने-फूलने नहीं दिया। 

अब जो चीनी उत्पादों के खिलाफ सोश्यल मीडिया पर चल रहे अभियान से चीन भड़क गया है। चीन का सरकारी मीडिया गाली-गलौज पर आ गया है। सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है  कि भारत सिर्फ भौंक सकता है और भारत में चीनी उत्पादों को चल रही बातें भड़काऊ हैं। भारतीय उत्पाद चाइनीज के मुकाबले नहीं टिक सकते। दोनों देशों के बढ़ते व्यापार घाटे पर भी भारत कुछ नहीं कर सकता। अखबार ने लिखा है कि पाक आतंकियों को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कराने के भारत के प्रयासों पर चीन के विरोध से भारतीय नाराज हैं। इसके चलते वहां सोश्यल मीडिया सहित कई प्लेटफार्म पर चीनी उत्पादों के बहिष्कार का अभियान चल रहा है। अखबार ने यह भी लिखा है कि अमेरिका किसी का दोस्त नहीं है। चीन को घेरने के लिए अमेरिका भारत को दुलार रहा है। इसके अलावा अखबार में ये भी लिखा है कि भारत में न बिजली है न पानी, कंपनियों के लिए वहां निवेश आत्मघाती होगा। वहीं, भारत के बजाय चाइनीज कंपनियां अपने ही देश में कारखाने लगाएं। भारत में बेचने के लिए चीनी प्रोडक्ट खरीदने भारतीय व्यापारी हर हाल में यहीं आएंगे। वहां कारखाने लगने से पैसा बर्बाद कर व्यवस्था क्यों बिगाड़ी जाए। वहीं भारत के पास काफी पैसा है  लेकिन अधिकांश पैसा राजनेताओं, अफसरों और उनके कुछ अंतरंग पूंजीपतियों के पास है। यह संभ्रांत वर्ग देश में अपना पैसा खर्च करना नहीं चाहता। इन्हीं वजहों से मेक इन इंडिया जैसे अव्यावहारिक योजनाएं शुरू की है। 

कोविड-19 के लिए आज सारी दुनिया चीन को दोषी मान रही है। आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए उसने तीसरा विश्वयुद्ध छेड़ दिया है। इस विश्वयुद्ध की न तो जमीन निश्चित है और न इसके कोई नियम कानून हैं। इसमें पारंपरिक हथियार भी प्रयोग नहीं हो रहे हैं। केवल एक वायरस के बलबूते चीन ने पूरी दुनिया को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया और अब अमेरिका जैसे विकसित देश बौखलाए खडे हैं। कहा जा रहा है कि इसी बौखलाहट के चलते विकसित देश चीन से अपने व्यावसायिक संबंध कम कर देंगे और यही भारत के लिए सुनहरा अवसर होगा। चीन जो कि विश्व के लिए देश नहीं बल्कि फैक्टरी की तरह काम करता है, वहां से विदेशी कम्पनियां अपना व्यवसाय हटा लेंगी और फिर उनको ऐसे देश की जरूरत होगी जहां व्यवसाय के हर क्षेत्र की लागत कम हो और वह देश होगा भारत।

बात है तो बहुत अच्छी है परंतु वास्तविकता के धरातल पर कितनी उतरेगी यह तो भविष्य ही बताएगा, क्योंकि अव्वल तो व्यवसाय शुद्ध नफे-नुकसान को देखकर किया जाता है। उसमें भावनाओं को कोई स्थान नहीं होता और दूसरा अगर भारत को यह मौका मिल भी गया तो भारत उसके लिए कितना तैयार है? यह सुनहरा सपना कहीं मुंगेरीलाल का हसीन सपना बनकर न रह जाए इसलिए हमें अपने गिरेबान में झांकना होगा।

चीन से जो व्यापार बाहर निकलने वाला है वह मुख्यत: मैनुफैक्चरिंग इंडस्ट्री हैं। जो कम्पनियां चीन से बाहर निकलेंगी वे निश्चित ही अन्य देशों में वही गुणवत्ता चाहेंगी जो चीन देता है। क्या भारत इसके लिए तैयार है?
 आज की तारीख में भारत में अगर किसी सेक्टर ने सबसे ज्यादा उन्नति की है तो वह है सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री। कम्प्यूटर के सामने बैठकर कोडिंग-डिकोडिंग करने वालों की तादाद बढ़ती चली जा रही है। यह शायद इसलिए क्योंकि भारत हमेशा से ही चिंतन करने वालों का देश रहा है। दिमागी काम करने वालों की बढ़ती मांग ने हर किसी के हाथ में माउस पकड़ा दिया। अब ये हाथ रंधा, छेनी, हथौड़ी पकड़ने या खेत में ट्रैक्टर चलाने को तैयार नहीं हैं। समाज में भी अभी तक दिमाग से काम करने वालों (व्हाइट कॉलर और ब्लू कॉलर)को ऊंची निगाहों और हाथ से काम करने वालों को नीची निगाहों से देखा जाता है। सबसे पहले तो इस खाई को पाटने की जरूरत है।

इसके लिए शुरूआत करनी होगी उन शिक्षा संस्थानों से जो छात्रों को (सोचने) के साथ-साथ (करना) भी सिखाए। हमारे यहां क्षमता या हुनर की कोई कमी नहीं है, परंतु उन्हें मेनस्ट्रीम बिजनेस से केवल इसलिए दूर कर दिया जाता है, क्योंकि वे अंग्रेजी नहीं जानते और बड़े भारी शब्दों में प्रेजेंटेशन नहीं दे सकते। हमारे लघु और कुटीर उद्योग इसी वजह से धीरे-धीरे सिमटते चले जा रहे हैं। इन उद्योंगों को भी अन्य उद्योगों की भांति यदि हर प्रकार की सहायता मिले, नई पीढ़ी यहां आने को तैयार हो तो ही आने वाले समय में भारत उस चीन की बराबरी कर सकता है जहां के बच्चे भी शारीरिक मेहनत करने से नहीं कतराते।
हमारे यहां की नई पीढ़ी अभी जिस शिक्षा व्यवस्था से गुजर रही है, वहां केवल उन्हें बनी हुई चीजों को विकसित करना या उसमें अगर कुछ कमियां रह गई हों तो उसे ठीक करना ही सिखाया जा रहा है। नया कुछ आविष्कार करने की सोच को मार दिया जाता है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि बाजार की मांग के अनुसार आपूर्ति करने में हम पीछे रह जाते हैं। निर्यात का तो छोड़िए हमारे अपने ही देश में कितने ही ऐसे आविष्कारों की आवश्यकता है। ये आविष्कारक समाज से ही निकलेंगे, सरकार के द्वारा केवल कौशल विकास और स्टार्टअप के कार्यक्रम बनाने से बात नहीं बनेगी। (जुगाड़ करने में हम भारतीय अव्वल हैं) कहकर हम ही हमारा मजाक बनाते हैं, जबकि उसका दूसरा पहलू नहीं देखते कि जुगाड़ ही उस आविष्कार की पहली सीढ़ी है जो आवश्यकता के कारण उत्पन्न हुआ है। यह जुगाड़ कोई आईटी प्रोफेशनल नहीं करता, कभी-कभी तो पांचवीं फेल कोई आदमी भी कर लेता है क्योंकि उससे उसकी आवश्यकता की पूर्ति हो जाती है।

कौशल विकास कार्यक्रम ऐसे ही (जुगाडू) लोगों के लिए होना चाहिए, क्योंकि कौशल अगर होगा तो ही उसका विकास होगा। कौशल किसी में उत्पन्न नहीं किया जा सकता। चार महीने का कोर्स करके फरार्टेदार अंग्रेजी बोली जा सकती है, छ: महीने का कोर्स करके प्रेजेन्टेशन बनाए जा सकते हैं परंतु अगर वह अंग्रेजी आवश्यकता, उत्पादन और आपूर्ति के बीच का पुल नहीं बन सकी तो कोई मायने नहीं रखेगी। अगर हम चाहते हैं कि चीन से निकलने वाली कम्पनियां भारत की ओर रुख करें और यहां टिक जाएं तो वर्तमान समाज को अपने सोचने की दिशा में परिवर्तन लाना होगा। यह सोच बदलनी होगी कि केवल कम्प्यूटर में कोडिंग करना ही उच्च शिक्षा की निशानी है। मां-बाप को अपनी पुश्तैनी कला बच्चों को सिखाकर उस कला को जीवित रखना होगा। जिन लोगों में हुनर है, कुछ नया करने का माद्दा है, उन्हें उपयुक्त सुविधाएं देनी होंगी। सरकार को मैनुफैक्चरिंग इंडस्ट्री को सहायता और बढ़ावा देने वाले नियम कानून बनाने होंगे। मजदूर यूनियनों को अपने निहित स्वार्थ से ऊपर उठकर देश के हितों में कार्य करना होगा। शिक्षा संस्थाओं पर मोटी फीस लेकर जो केवल डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजर और वकील बनाने का भूत सवार है उसे उतारकर ऐसे व्यवसायी तैयार करने होंगे जो जरूरत पड़ने पर खुद टूलबॉक्स उठाने से न कतराएं। सौ बात की एक बात यह है कि कोरोना काल में अगर कुछ अच्छा हुआ है तो वह यह है दुनिया हमारी तरफ आशापूर्ण द़ृष्टि से देख रही है। उसकी आशा की पूर्ति करना हमारी आज की सोच और भविष्य के दृढ संकल्पों और योजनाबद्ध कार्यप्रणाली पर निर्भर होगा।