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किसानों द्वारा प्रकृति के साथ खिलवाड़ निरंतर जारी
April 14, 2020 • ललित भारद्वाज  • मध्यप्रदेश


विगत 20-25 सालों से किसान भी अपना दायित्व भूलकर प्रकृति के साथ खुला खिलवाड़ कर रहे हैं और तो और मजदूरों का रोजगार भी छीन रहे हैं क्योंकि इन वर्षों में किसानों द्वारा धान व गेहूं का भूसा अधिकांशत: जलाया ही जा रहा है। थोड़े से समय को बचाने के फेर में किसान अपनी नैतिकता भूल गए हैं। कोई समय था जब गेहूं व धान मजदूरों द्वारा काटा जाता था। पश्चात थ्रैशर से गेहूं अलग निकाली जाती थी तथा भूसा अलग से बनकर तैयार हो जाता था। इसी तरह धान का भूसा (पराली) भी अलग से निकाल लिया जाता था। लेकिन विगत 20-25 सालों से इस कटाई में किसानों द्वारा अपने धान व गेहूं की कटाई बड़ी-बड़ी हार्वेस्टर मशीनों द्वारा कराई जा रही है। इस प्रक्रिया के तहत कई तरह के नुकसान हो रहे हैं, लिहाजा लाखों टन गेहूं का भूसा जो पशुधन के आहार के रूप में काम आता था उसकी कमी के कारण पूरे देश में असंख्यों पशु भूख के कारण मरने लग गए हैं। उधर धान का भूसा कागज व कार्डबोर्ड बनाने में सहायक होता था उसे भी किसानों द्वारा जला दिया जा रहा है। जबकि सच्चाई तो यह है इन फसलों का विशेष रूप से गेहूं का भूसा तो आज भी अच्छे दामों में बिकता है लेकिन न जाने क्यों किसान प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके न केवल अतिरिक्त धन से ही वंचित हो रहा है साथ ही साथ उसके द्वारा धरती की उर्वरक शक्ति को भी नष्ट किया जा रहा है। क्योंकि जब खेतों में खड़े भूसे को अग्नि के भेंट किया जाता है तो उस भूसे के साथ धरती की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने वाले लाखों कीट-कीटाणु भी अग्नि की की भेंट चढ़ जाते हैं। ऐसे में धरती की उर्वरक शक्ति दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। कोई वक्त था जब किसान अकाल पीड़ित प्रदेशों में पशुओं के लिए हजारों टन भूसा या तो दान के रूप में और या कम दामों में बेचकर पशुधन के जीवन की रक्षा किया करते थे। आज भी हिंदुस्तान में ऐसे कई राज्य हैं जहां पशुओं को हरा चारा 12 महीनों प्राप्त नहीं होता। मात्र वर्षा ऋतु में ही ऐसे राज्यों में हरा चारा पशुओं को प्राप्त होता है। आज भी 12 महीनों हरा चारा जिन प्रदेशों में पशुधन को नसीब नहीं होता वहां गेहूं का भूसा ही पशु आहार का सहारा बना हुआ है। अब जब गेहूं व धान का भूसा जलना शुरू हो गया है तो ऐसे में हवा में जहरीले धुएं की वजह से वातावरण में प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि देश में विशेष रूप से उत्तर भारत में इन दोनों प्रकार के भूसों के जलने की वजह से लोगों में सांस, गला, आंख व फेफड़ों की बीमारी के साथ-साथ सर्दी-जुकाम जैसी कई बीमारियां होने लग गई हैं। पूरा उत्तर भारत धान के भूसे के जलने की वजह से बहुत ज्यादा प्रदूषित हो चुका है। लेखक किसानों से मात्र आग्रह कर सकता है कि किसान भाइयों थोड़े से समय को बचाने के फेर में प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद कर दो। पशुधन पर दया करो। प्रदूषण पर लगाम लगाओ। ऐसा करने से आपको जहां एक ओर भूसे की बिक्री से थोड़ी बहुत कमाई होगी वहीं दूसरी ओर पशुधन के चारे के साथ-साथ आपके खेतों की उर्वरक शक्ति भी बरकरार रहेगी। दूसरी ओर राज्य सरकारों को इस संदर्भ में किसानों के प्रति कड़ा रुख अपनाना चाहिए। इसके साथ-साथ लेखक किसानों से एक प्रार्थना और कर रहा है और वह यह कि प्रत्येक किसान अपने खेत के चारों तरफ ढेर सारे नहीं तो कुछ छायादार पेड़ जरूर लगाना शुरू कर दे यह भी किसानों का प्रकृति के साथ न्याय होगा।