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कितना बदल गया इनसान...
May 11, 2020 • JAWABDEHI • संपादकीय

जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र


कोरोना काल में मानवता भूले
कोरोना महामारी हमारे जीवन में इस कदर घुस गई कि लोगों को ये लगने लगा है कि अब दुनिया खत्म होने को है। मैं बच सकूंगा या नहीं या मेरा परिवार सुरक्षित रहेगा या नहीं, ये चिंता दिन-रात लोगों को सता रही है। वहीं, लालची और भ्रष्टाचारी इस कोरोना काल में रुपया बटोरने में लगे हैं। इस परेशानी के दौर में जब इंसानियत रखना चाहिए, तो ये लोग घपले कर रहे हैं, कालाबाजारी कर रहे हैं। जनता जीवन-मरन के बीच अपने दिन गुजार रही है। कोई खाने के लिए परेशान है तो कोई अस्पताल तो कोई नौकरी को लेकर चिंतित है, लेकिन इन लालचियों को अपना घर भरने की पड़ी है। कुछ ऐसे ही मामले इस संकट की घड़ी में देखने को मिले।

सबसे बड़ा घपला देश में रैपिड टेस्ट किट खरीदने में किया गया, घपला करोड़ों रुपयों का किया गया। जो रिपोर्ट प्रकाशित की जा रही है, उस पर भरोसा करें तो प्राइवेट कंपनी ने चीन से 245 रुपए की रैपिड टेस्टिंग किट खरीदकर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) को 600 रुपए प्रति के किट के हिसाब से बेच दी है। कंपनी को 18 करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा हुआ।  मामला अदालत भी पहुंचा। जहां कंपनी को इस मुनाफाखोरी के लिए फटकार लगाई गई। जिसके बाद कंपनी 400 रुपये प्रति किट की दर से आपूर्ति करने के लिए तैयार हो गई। इस सौदे में बिचौलिए ने देश को परे रखकर अपना हित साधा। अब सजा सरकार को मिलती है या इस बिचौलिए को ये तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल जनता की परेशानी कम होते नजर नहीं आ रही है, क्योंकि इस लॉकडाउन में लालचियों का धंधा बड़े जोर-शोर से चल रहा है। जैसे ही लॉकडाउन की घंटी बजी तो किराना व्यापारी कहां पीछे रहने वाले थे। उन्होंने तत्काल किराना के भाव बढ़ा दिए। आज खाद्य सामग्री महंगी हो गई है। दुकान वाले सीधे मुंह बात नहीं कर रहे हैं ग्राहकों से। लिस्ट दो, जो रेट दुकानदार ने लिख दिए, उतने ही रुपये आपको देना है, भले ही उसने ज्यादा कीमत आपसे वसूल ली हो। अब बारी आती है सब्जी वालों की, जनता कर्फ्यू वाले दिन तक 20 रुपए किलो में मिलने वाला आलू 40 से 50 रुपए किलो बिकने लगा। टमाटर ने भी लाली दिखाई और 50 से 60 रुपए किलो में बेचे जाने लगा। और दूर-दराज की  टाउनशिप में रहने वालों ने टमाटर 80 से लेकर 100 रुपए किलो में खरीदा। गांव में रहने वाले किसान अपनी उपज शहर में लाना चाहते थे, लेकिन प्रशासन उसे जब्त कर या तो चिड़ियाघर भेज देता या फिर निगमकर्मी शाम ढलते ही घर-घर बेचने लग जाते। किसान को तो कुछ नहीं मिला, निगमकर्मियों की धाड़की बंध गई। जब दूसरा दौर लॉकडाउन का शुरू हुआ तो नगर निगम ने घर-घर सब्जी पहुंचाने का बीड़ा उठाया और 150 रुपए दाम तय किए, लेकिन जब गृहणियों के हाथों में सब्जी पहुंची तो सड़ी मिर्च, बदबूदार सब्जियां और टमाटर-आलू सहित तमाम सब्जियों में काटा मार दिया गया, तौल कम कर सब्जियां घर-घर पहुंचाई गई। शिकायत हुई तो अफसरों ने कह दिया व्यवस्था में सुधार किया जा रहा है। इंदौर नगर निगम ने गरीबों को फ्री का राशन देने की व्यवस्था और बकायदा टेलीफोन नंबर अखबारों में छपवाए गए। राशन जब गरीबों के हाथों में पहुंचा तो आटा काला देखकर उन्हें सहज ही लग गया कि इस दौर में भी शासन-प्रशासन के अधिकारी-कर्मचारी कालाबाजारी कर रहे हैं। चावल गरीबों को ऐसे दिए जैसे पक्षियों को जो दाना चुगने के लिए दिया जाता है वैसे। कुल मिलाकर गरीबों को छला ही गया। 

हम सिर्फ इंदौर की ही बात करें तो ये बात सच्ची है कि अगर इंदौर के समाजसेवी जागृत नहीं होते और इंसानियत की खातिर खड़े नहीं होते तो कई गरीब लोग कोरोना से तो नहीं मरते, लेकिन भूख से जरूर मर जाते। जवाबदेही ने गत अंक में भी इस बात को प्रमुखता से प्रकाशित किया था, कि इंदौर की गरीब जनता आज भी समाजसेवियों के सहारे है। सरकारी फ्री का राशन उन्हें कब और कैसे मिल रहा है ये तो उनकी आत्मा ही जानती है। आज लिस्ट में नाम लिखवा रहे हैं तो 8 से 10 दिन में राशन उनके घर पहुंच रहा है। 

गोकुलदास अस्पताल के खिलाफ महिला का गुस्सा : वीडियो वायरल
इन दिनों मध्यप्रदेश की लाइफ-लाइन कहे जाने वाले निजी अस्पताल व्यावसायिक दुकानें बनकर सामने आ रही है। कुछ ऐसा ही मामला इंदौर के गोकुलदास अस्पताल का सामने आया। महू की रहने वाली नम्रता पांडे ने ये वीडियो वायरल किया है। उन्होंने अपने सात हुई धोखाधड़ी का स्पष्ट उल्लेख किया है। उन्होंने वीडियो के माध्यम से बताया कि उन्होंने अपने ससुर को 24 अप्रैल की शाम को गोकुलदास अस्पताल में भर्ती किया था। उनके पति के कहने के बाद स्टाफ ने इलाज शुरू किया और इंजेक्शन लगाए। आराम होने पर परिजन ने अस्पताल से डिस्चार्ज के लिए कहा तो सीनियर डॉक्टर का कहना था कि कोविड-19 की सैंपल रिपोर्ट आने के बाद डिस्चार्ज कर देंगे। इस तरह 30 अप्रैल हो गई। नम्रता पांडे बार-बार जानकारी ले रही थी, लेकिन उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही थी। उन्होंने बाद में पुलिस में शिकायत की बात कही तो उन्हें बताया गया कि उनके ससुर की रिपोर्ट निगेटिव है। खास बात ये कि रिपोर्ट 24-25 अप्रैल को आ गई थी, लेकिन अस्पतालवालों ने तब बताया जब महिला ने शिकायत की बात कही। महिला इस दौरान बार-बार कहती रही कि अस्पताल का बिल बढ़ रहा है, तो डॉक्टर का जवाब ऐसा था कि बिल का क्या है मैडम..., पुलिस दो डंडे मारती है तो लोग 50 हजार रुपए भी दे दे जाते हैं.., (जैसा कि नम्रता ने वीडियो में कहा)। गोकुलदास अस्पताल से 76,600 रुपए का बिल वसूला गया।
 सवाल ये है कि जब रिपोर्ट 24-25 अप्रैल को आ गई थी तो अस्पताल वालों ने मरीज को डिस्चार्ज क्यों नहीं किया। वहीं नम्रता इसके लिए कानूनी कार्रवाई करने की बात कह रही है।
निजी अस्पतालों को लेकर इंदौर के लोगों को अब सोचना होगा, क्योंकि जिस तरह निजी अस्पताल वालों ने  धोखाधड़ी की है, वो कतई माफ करने वाली नहीं हो सकती है। 

जवाबदेही अपील
घर में रहे, सुरक्षित रहे, एक-दूसरे से दूरी बनाकर रहे, बाजारों में सामान खरीदने के लिए भीड़ न लगाएं, प्रशासन के नियमों का पालन करें