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फिर एक दिन मिल गया विदेशी संस्कृति अपनाने का....
February 10, 2020 • JAWABDEHI • संपादकीय

जगजीतसिंह भाटिया
प्रधान संपादक


वेलेनटाइन-डे क्या है ये...? एक विदेशी संस्कृति, जिसे हमारे देश का युवा दिल से आत्मसात करने लग गया है। एक भेड़चाल देखने को मिल रही है। इस दिन का हमारी संस्कृति से कोई तालमेल नहीं है, लेकिन युवाओं की प्रणय लीला देख दुकानदारों ने भी सारी हदें पार कर दी हैं। पूरी दुकान को लाल रंगों में सजा कर तरह-तरह की वस्तुएं बेच रहे हैं। तरस आता है हमारी युवा पीढ़ी पर कि वे क्या इसी हिंदुस्तान के भविष्य कहे जाने वाले नवयुवक है, जो भटकाव वाले रास्ते पर ज्यादा जाना पसंद करते हैं। अगर हकीकत में ये देश का भविष्य है तो  यह हमारे पूर्वजों के लिए दुर्भाग्य और राष्ट्र के लिए कंलक का कारण बनता जा रहा है। युवाओं को लगने लगा है कि आजादी खैरात में मिली है, लेकिन वो ये नहीं जानते कि कितनी पीढ़ियों ने अपने परिवार की कुर्बानी दी है। कितनी एड़ियां रगड़ी है अंग्रेजों के सामने, तब जाकर आज की पीढ़ी खुली हवा में सांस ले रही है। 
हमारे देश को आजादी दिलाने वाले सपूतों सुभाषचंद बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, खुदीराम बोस, अशफाक उल्लाह खान, तात्या टोपे सहित तमा ऐसे वीर हैं, जिन्होंने देश को गुलामी से आजाद कराने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया देश के नाम पर।...और आज हम देख रहे हैं कि 14 फरवरी का युवा पीढ़ी बड़ी बेसब्री से इंतजार करती दिखाई दे रही है। इस वेलेनटाइन-डे (पश्चिमी सभ्यता) ने भारतीय संस्कृति को तहस-नहस करके रख दिया है। जिस तरह दुकानों से लाल रंग के गिफ्ट भारी तादाद में युवा पीढ़ी खरीदती है और अपनी गर्ल फ्रेंड को देती है, क्या उन्होंने कभी आजादी के लिए शहीद हुए क्रांतिकारियों की तस्वीरें खरीदी और किसी को भेंट की। या कभी उन्होंने अपने घरों में इन क्रांतिकारियों की तस्वीरें लगाई। इस दिन का विरोध बरसो से सिर्फ हिंदूवादी संगठन जैसे श्रीराम सेना, बजरंग दल और शिवसेना करती है, जिसे लोगों के उलाहने भी सहने पड़ते हैं। लाख कोशिशों के बावजूद इस दिन को मनाने का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है और बच्चों के माता-पिता भी अपने बच्चों को ये बात नहीं बता रहे हैं कि इस दिन को जिस उत्साह के साथ तुम लोग मना रहे हो...ये गलत बात है। दूसरी ओर मां-बाप ने तो बच्चों को शहरों में छोड़ दिया है पढ़ाई के नाम पर। वो क्या कर रहे हैं, उनके दोस्त कौन-कौन है, उसके बारे में जानना तक नहीं चाहते। वेलेनटाइन-डे के रास्ते धीरे-धीरे युवा पीढ़ी लिव-इन में रहने लग गई हैं। मां-बाप भी शायद यही सोचने लग गए हैं कि चलो टंटा मिटा और खर्चा बच गया शादी करने का। लेकिन वो ये भूल कर रहे हैं कि उनकी एक पीढ़ी इसी रास्ते बर्बाद होती जा रही है। क्योंकि उनकी बेटी और बेटे से जो संतान पैदा होगी वो इनसे और ज्यादा ‘एडवांस्ड’ होगी। क्योंकि लिव इन में रहने वालों की संतान भी उसी माहौल में पली-बढ़ी होगी, जिस माहौल में उनका जन्म हुआ है। 

ऐसे शब्द संस्कार नहीं देते
इंदौर में जालसभा गृह में दो दिवसीय सम्मेलन हुआ। इसमें इंदौर सहित तमाम जगहों से महिला साहित्यकारों ने अपनी आमद दी। महिला साहित्यकारों ने माइक संभाला और कहने लगी कि हमने मिस यूनिवर्स को अपना मूल्य समझ लिया है। दैहिक सौंदर्य को यहां पुरस्कृत किया जाता है। पुरुषों के काम में आने वाली हर वस्तु के विज्ञापन में स्त्री क्यों नजर आती है। वहीं एक अन्य महिला साहित्यकार ने कहा कि (हम लड़कों से पूछते हैं बता तेरी गर्लफ्रैंड कितनी है, जबकि लड़कियों से नहीं पूछा जाता कि बता तेरे बॉयफ्रेंड कितने हैं) इन महिला साहित्यकारों से एक सवाल है कि क्या उनके बोले हुए शब्द किसी लड़की को संस्कार देते हैं? जिस तरह कहा जा रहा है कि महिलाओं को पुरुषों की तरह कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ना चाहिए। क्या कभी वर्तमान की युवा पीढ़ी को इन साहित्यकारों ने सड़कों पर देखा है, पबों में देखा है, बार में देखा है। पुरुषों से आगे निकल गई हैं लड़कियां। सरेराह सिगरेट पी रही है, पैग लगा रही हैं। मॉडलिंग करने के लिए घर से ही उकसाया जा रहा है।  हमारे देश के समाज को सुधारना है तो पहले घर से विदेशी संस्कृति को निकालकर बाहर करना होगा। बच्चों को सीख देना होगी कि हम भारत के लोग है, जहां संस्कृति और परंपराओं को मानना होगा। कुछ चंद शब्द कहीं पर बोल देने से तालियां तो बटोर लोगे, लेकिन मन का बोझ कम नहीं होगा।