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पुत्र के मोह जाल में फंसे उद्धव  न घर के रहे न घाट के...
November 23, 2019 • JAWABDEHI • राजनीति

जगजीतसिंह भाटिया
प्रधान संपादक

इतिहास गवाह है कि जब भी किसी राजा या राजनीति के उच्च पद पर बैठा व्यक्ति पुत्र मोह में पड़ा उसकी राजगद्दी या तो छीन ली गई या फिर जनता ने ऐसे नेता को कुर्सी से लात मारकर उतार दिया है। ऐसा ही कुछ हुआ महाराष्ट्र में भाजपा के दम पर शिवसेना ने 56 सीटें हासिल की और उद्धव पुत्र मोह में विवश हो गए और शरद पवार की शरण में जाकर बैठ गए। पद लालसा ने उन्हें न घर का रखा न घाट का..., उनके सिपहसालार यह तक कहने लगे कि इस बार अगर शिवसेना का मुख्यमंत्री नहीं बना तो फिर कभी नहीं बनेगा और उनके बेटे का राजनीतिक जीवन बर्बाद हो जाएगा।

 

राजनीतिक द्वंद्व और बेटे के मोहजाल में फंसे उद्धव  को लगा कि शायद ये मेरे और मेरे बेटे के भविष्य की चिंता व्यक्त कर रहे हैं, लेकिन ये नहीं समझ सके कि कांग्रेस की ही नींव कमजोर है तो वह उन्हें क्या सहारा देगी.., और बैठक पर बैठक चलती रही और भाजपा ने शतरंज की सारी चालों को उलटकर रख दिया। उद्धव ये नहीं समझ पाए कि जो कांग्रेस 44 सीटें लेकर आई और इधर-उधर की जुगाड़ कर सरकार बनाने की जुगाड़ लगा रही है और देश में जनाधार खो चुकी है तो सिर्फ एक हां कहने के लिए चंद सेकंड थे, उद्धव के पास। उनके हां कहने पर उसी समय भाजपा की सरकार बनती तो भले ही मुख्यमंत्री उद्धव नहीं बनते, उनका बेटा नहीं बनता..., लेकिन जिस बेटे के लिए उन्होंने शिवसेना को बैकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया आज उसकी इतनी किरकिरी नहीं होती।

उद्धव को सिर्फ एक बात समझ में नहीं आई कि जब पुत्र मोह में फंसी सोनिया गांधी केंद्र में सरकार नहीं बना पाई तो फिर महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे कैसे सरकार बना लेते। यहां यह बात तो प्रबल हो गई कि अब कोई नेता अगर पुत्र मोह में पार्टी को ताक में रखेगा तो उसे न तो जनता स्वीकार करेगी और न ही पार्टी। वैसे शिवसेना महाराष्ट्र सहित पूरे देश में अपनी साख खो चुकी है, क्योंकि उसका कांग्रेस को समर्थन देने से जनता के मन में पीड़ा हुई है। अगली बार जनता के सामने शिवसेना के उद्धव ठाकरे क्या मुंह लेकर जाएंगे, ये तो समय बताएगा।