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सात फेरों के समान सप्तपदी : प्रधानमंत्री ने सात दिनों तक मांगा फिर साथ
April 14, 2020 • JAWABDEHI • मध्यप्रदेश


सात बातें इसलिए महत्वपूर्ण क्योंकि इन सात बातों पर समाज में है विसंगति

इंदौर। कोरोना वायरस के संकट से लड़ते हुए हमने 13 अप्रैल तक (21 दिन) लॉक डाउन में रहकर देखे, और अब 3 मई तक यानी कुल 19 दिन हमें फिर लॉक डाउन में रहना होगा। लॉक डाउन का दूसरा दौर 14 अप्रैल से शुरू हो गया है। जिस प्रकार हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात बातों को अमल में लाने के लिए कहा, क्योंकि ये सात बातें (सप्तपदी) ही देश को कोरोना के संकट से बचा सकती है। इन सात बातों को हम यूं भी मान सकते हैं, कि जिस तरह से शादी के समय पंडित हमें सात फेरे लेकर सात वचन अपनी पत्नी की सुरक्षा को लेकर लेने के लिए कहते हैं, ठीक उसी तरह जो सात बातें प्रधानमंत्री ने देशवासियों के लिए कही है, उसे अपनाना है। 

इन सात बातों को प्रधानमंत्री को शायद इसलिए भी बताना पड़ी, क्योंकि आज भी समाज में इन सात बातों के विरुद्ध बातें होती हैं, जो समाज को प्रभावित करती है।
जैसे हम प्रधानमंत्री द्वारा कही गई बातों पर ध्यान दे तो उसे लेकर समाज में विसंगति ही देखने को मिलती है।

पहली बात - अपने घर के बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें। खासकर ऐसे व्यक्ति जिन्हें पुरानी बीमारी हो, उनकी हमें एक्स्ट्रा केयर करनी है। उन्हें कोरोना से बहुत बचाकर रखना है। 
विसंगति : आज कोरोना का डर जो लोगों के मन में है, उस वजह से कुछ लोग बुजुर्गों की चिंता करते दिखाई दे रहे हैं। वहीं, कुछ लोग उन्हें इस लॉक डाउन के समय बाहर भेज रहे हैं, ताकि घर में दूध, सब्जी, दवाई सहित जरूरी सामान सुगमता से वह ला सके, भले ही बुजुर्ग व्यक्ति को कुछ भी हो जाए। ऐसा ही नजारा हमारे प्रतिनिधि को नंदानगर मेन रोड पर दिखा। एक बुजुर्ग व्यक्ति सर्वहारा नगर की गली नं. 2 से बाहर निकले और नंदानगर की तरफ लकड़ी टेक-टेक कर जा रहे थे। उनसे पूछा कि दादा इतनी धूप में बाहर क्यों निकले तो उन्होंने पहले कुछ नहीं कहा, दोबारा पूछने पर बोले कि मेडिकल तक जा रहा हूं, दवाई लानी है। उनसे पूछा कि घर में कोई और नहीं है क्या, तो उन्होंने कहा कि जवान लोग बाहर निकलेंगे तो पुलिस कार्रवाई करेगी, उन्हें जेल में डाल देगी..., लेकिन झूठ उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था। 

 

दूसरी बात- लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग की लक्ष्मण रेखा का पूरी तरह पालन करें। घर में बने फेस कवर या मास्क का अनिवार्य रूप से उपयोग करें।

विसंगति : हम सिर्फ इंदौर की बात करते हैं। पूरे शहर में सोशल डिस्टेसिंग का पालन नहीं हो रहा है। केवल मेडिकल की दुकानों पर ही इसका पालन होता दिखाई दे रहा है। सब्जी-भाजी शहरभर में गली-गली में बेची जा रही है, जहां किसी भी प्रकार का सोश्यल डिस्टेसिंग (सामाजिक दूरी) का पालन नहीं हो रहा है। लोग बगैर मास्क लगाए बाहर निकल रहे हैं। सामान खरीदते समय भी लापरवाही। पास-पास बैठकर बातें कर रहे हैं। सुबह के समय गली-मोहल्लों से लेकर सड़कों तक पर चहल कदमी दिखाई दे रही है। 

तीसरी बात- अपनी इम्युनिटी बढ़ाने के लिए आयुष मंत्रालय द्वारा जो निर्देश दिए गए हैं, उनका हम पालन करें। गर्म पानी-काढ़ा का निरंतर सेवन करें।

विसंगति : इस बात का भी लोग पालन नहीं कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि चाय पी तो वह भी तो गरम है, जबकि सुबह-शाम दोनों समय नमक के गरारे जरूर करना चाहिए, जिससे गले में काफी राहत महसूस होती है। 

चौथी बात- कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए आरोग्य सेतु मोबाइल ऐप जरूर डाउनलोड करें। दूसरों को भी इस ऐप को डाउनलोड करने के लिए प्रेरित करें।
विसंगति : मंगलवार सुबह जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोबाइल पर आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड करने का आग्रह किया तो लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रिया मिली। युवा कहते दिखाई दिए कि क्या कोई ब्लू टूथ से वायरस का पता चलता है क्या? ऐसी कई बातों को वो नकारते दिखे, जिससे साफ दिखाई देता है कि उन्हें अभी भी कोरोना से डर नहीं लग रहा।

पांचवीं बात- जितना हो सके, उतनी गरीब परिवार की देखरेख करें। उनके भोजन की आवश्यकता पूरी करें। 
विसंगति : लॉक डाउन के बाद पूरे देश में सिर्फ एक बात पर जोर दिया जा रहा है कि कोई भूखा न सो सके। गरीबों के लिए सरकार ने कई योजनाएं लागू की है। वहीं, इंदौर की बात करें तो कई सामाजिक संगठन गरीबों तक राशन से लेकर भोजन के पैकेट तक पहुंचा रहे हैं। लेकिन गरीब तबका कोरोना जैसी बीमारी को लेकर सजग नहीं है और ना ही इसमें यह डर है कि उसे अगर ये बीमारी हो गई तो उसके साथ न जाने कितने लोग इसका शिकार हो जाएंगे। वहीं प्रधानमंत्रीजी ने कहा कि गरीब परिवारों की देख-रेख करो तो इंदौर में तो ये बात देखने को मिल रही है कि गरीब लोगों ने करीब-करीब तीन से चार माह का अनाज घर में भर लिया है। जैसे ही प्रधानमंत्री ने पहला लॉक डाउन लगाया था, तब तीन माह का राशन कंट्रोल से ले लिया था। और जैसे ही लॉक डाउन हुआ, उसके पहले ही दिन से सामाजिक संगठन और दान-दाताओं ने मैदान संभाल लिया और खुले हाथों राशन दे रहे हैं और कुछ संगठन भोजन के पैकेट इन गरीबों के घर तक पहुंचा रहे हैं। तो अनाज इन्होंने जमा किया है वह उपयोग में नहीं आ रहा है।  दानदाताओं के माध्यम से मिला अनाज गरीबों के घर में इतना भर गया है कि रखने के लिए उनके घरों में जगह नहीं है। कुछ दिनों बाद बारिश शुरू होगी और नमी की वजह से दाल, चावल सहित खड़े अनाज और आटे में घून लग जाएगा और खाद्य सामग्री खाने योग्य नहीं रहेगी। लेकिन नामसमझ लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। कुछ दिनों बाद घून लगी खाद्य सामग्री नगर निगम की कचरा गाड़ियों में मिलेगी।

छठी बात- अपने उद्योग में काम करने वाले लोगों के प्रति संवेदना रखें। उन्हें नौकरी से न निकालें।
विसंगति : इस संकट के दौर में सबसे ज्यादा मुसीबत निजी सेक्टर की हो गई है। उन्हें सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही है। पूरा फोकस गरीब तबके पर लगा रखा है, जिसके प्रति सभी की सहानुभूति है, लेकिन छोटे व्यापारियों पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तो वेतन देना दूसरा व्यवसाय और लेन-दे बंद होने और तमाम खर्चों की वजह से नगदी का संकट भी उनके सामने हैं। सरकार को व्यापारी और उद्योगपति की परेशानियों को भी ध्यान में रखकर कुछ हित वाले निर्णय लेने चाहिए, ताकि व्यापारियों पर कोई संकट न आए।

सातवीं बात- हमारे सफाईकर्मी, पुलिसकर्मी, डॉक्टर्स का हम सम्मान करें, उनका गौरव करें।
विसंगति : सातवीं बात, सातवें फेरे के समान बहुत महत्वपूर्ण है, कि सफाईकर्मी, पुलिसकर्मी, डॉक्टर्स सहित तमाम लोग जो कोरोना से लोगों को बचाने में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, उनका सम्मान करें, लेकिन पहले लॉक डाउन में जिस तरह तबलीगी जमात और मुस्लिमों ने स्वास्थ्यकर्मियों से अमानवियता की, वह उनके समाज को ही लज्जित कर बैठी। ये लोग कोरोना योद्धाओं का गौरव करने की बजाए उनसे मारपीट तक करने लग गए। जो लोग इनकी जान बचाने में लगे हैं, उन्हें ही ये नफरत से देखते हैं।