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उत्तर प्रदेश में अपहरण का ये दर्द कोई नया नहीं है...
July 27, 2020 • JAWABDEHI • संपादकीय

जगजीत सिंह भाटिया
प्रधान संपादक
जवाबदेही समाचार पत्र

फिल्म अपहरण उत्तर प्रदेश के बढ़ते अपराध पर बनाई गई थी। इस फिल्म में नेताओं और गुंडों के मेलजोल का  का चित्रण  बेहतर तरीके से किया गया था। बाहरी दुनिया से लेकर जेल की दुनिया तक में फिरौती मांगने वालों की किस तरह आवभगत की जाती है, वो इस फिल्म में दिखाया गया था। सिर्फ इसी फिल्म की बात हम नहीं करते, लगभग किसी न किसी फिल्म में ये दृश्य दिखाए जाते हैं कि किस तरह जेल में नेता और पुलिस की संरक्षण वाले अपराधियों को मौज-मस्ती तक कराई जाती है। फिल्म में वो ही दिखाया जाता है, जो किसी न किसी घटना पर आधारित होता है। उत्तर प्रदेश में अपहरण होना आम बात है। कोई बच जाता है तो कोई पैसा देकर भी अपनों को खो देता है। कानपुर के अपहरण कांड में भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ। अपहरण संजीत नामक युवक का 22 जून को होता है, 29 जून को परिजन के पास फिरौती के लिए फोन आता है, जिसमें 30 लाख रुपये मांगे जाते हैं। अपहरणकर्ता के कहे अनुसार 11 जुलाई को पुल के ऊपर रूपये बैग में रखकर फेंके जाते है। और 30 लाख रुपये जाने के बाद भी बेटा मिलता भी है तो लाश के रूप में। परिवार ने घर, जेवर और बेटी की शादी के लिए जमा धनराशि तक दांव पर लगा दी और जैसा पुलिस ने कहा वैसा करते गए। पिता का आरोप है कि पुलिस ने ही रकम का इंतजाम करने को कहा था और बाद में पैसा आपस में बांट लिया। 

पुलिस चाहे किसी भी राज्य की हो, उनके काम करने का तरीका एक जैसा है। देश सेवा का जज्बा सिर्फ नौकरी पाने तक ही रहता है, उसके बाद देश गया तेल लेने। पुलिस तब हरकत में आती है, जब पुलिस की कॉलर कोई गुंडा पकड़ लेता है, तब ही इस वर्दी में जोश दिखाई देता है। और सच यह भी है कि पुलिस से बड़ा कोई ‘गुंडा’ नहीं है, क्योंकि ये संवाद हम फिल्मोें में भी देखते आ रहे हैं और हकीकत में दिखाई देता है। अब कानपुर के अपहरण कांड में 11 पुलिसवालों को मुख्यमंत्री योगी ने निलंबित तो कर दिया है, लेकिन पुलिस ईमानदारी से काम कब करेगी, इनकी कार्यप्रणाली कब सुधरेगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।